मध्य भारत में नर्मदा-सोन स्थलानुरेख क्षेत्र के पश्चिमी भाग के तले भूपर्पटीय विद्युत संरचना को एक ग्रिड (~7-8 किमी जगहों के बीच दूरी) में वितरित 153 स्टेशनों के मैग्नेटोटेलूरिक (एम टी) डाटा सेट का उपयोग करके प्रतिबिंबित किया गया है। इस डाटा सेट के त्रिविमीय प्रतिरूपण ने भूपर्पटीय स्तंभ में अलग-अलग गहराई स्तरों पर अलग-अलग ज्यामितियों वाले कई बड़े भूपर्पटीय चालकों को प्रकट किया, जिनकी प्रावार से व्युत्पन्न मैफिक-अतिमैफिक पिंड होने की व्याख्या की गई। हम अनुमान लगाते हैं कि ये पिंड उत्तर क्रिटेशस कल्प के दौरान पुनर्योग तप्त स्थल के ऊपर से भारतीय महाद्वीप के गुजरने के कारण उत्पन्न दक्कन ज्वालामुखीय प्रकरण के बृहत् आग्नेय प्रांत (एल आई पी) के अंतर्वेधी घटक का प्रतिनिधित्व करते हैं। अधस्तल मैग्मीय पिंडों, जिन्होंने दक्कन लावा के बहाव के लिए मैग्मा कक्षों के रूप में काम किया होगा, की स्थिति और ज्यामिति यह संकेत करती हैं कि वे दक्कन ज्वालामुखीय प्रकरण के एल आई पी की साहुल (प्लंबिंग) ज्यामिति से निकटता से संबंधित हैं।

राजस्थान और उसके आसपास के क्षेत्रों वाले भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग में क्षेत्रीय पैमाने के गभीर 3डी विद्युत प्रतिरोधकता परिवर्तन से, उत्तर पश्चिम में जैसलमेर से लेकर दक्षिण पूर्व में उज्जैन तक, स्थलमंडल की बुनियाद पर उ प - द पू दिशा में एक ~ 100 किमी गलियारे तक सीमित एक उच्च चालकीय मंडल (<10 ओम-मीटर) का पता चला, जिसके लिए पुनर्योग प्रावार प्लूम के पूर्व-विस्फोट अवशेष को उत्तरदायी बताया जा सकता है। यह भी ध्यान देने की बात है कि उच्च चालकीय मंडल का परिमाण दक्षिण पूर्व की ओर बढ़ता है और उथले स्तर तक ऊपर उठता है जो कि चालकीय मैग्मा कक्षों के लिए एक संभरक के रूप में काम किया होगा, जिसके परिमाण स्वरूप अंततः ~ 65 मिलियन वर्ष पहले दक्कन ट्रैप्स का बहाव घटित हुआ।

मध्य भारतीय विवर्तनिक मंडल (सी आई टी जेड) में निचले भूपर्पटीय भूकंप आने के संबंध में सी आई टी जेड के आर-पार कई प्रोफाइलों के समानांतर मैग्नेटोटेलूरिक (एम टी) डाटा से व्युत्पन्न भूपर्पटीय प्रतिरोधकता परिच्छेदों का और अन्य भूभौतिकीय एवं भूवैज्ञानिक डाटा से प्राप्त अधस्तल व्यवरोधों का उपयोग करके जांच की गई। एम टी प्रतिरूपों ने निचली भूपर्पटी के अधिकांश हिस्से में बहुत कम मात्रा में (<1 मात्रा %) जलीय तरल पदार्थों को अनुमानित किया है, जो कि अपराश्म और अन्य भूभौतिकीय डाटा के साथ संयोजन में एक प्रधान भंगुर / अर्ध-भंगुर निचली भूपर्पटीय प्रवाहिकी का समर्थन करता है। प्रतिरोधकता प्रतिरूपों, विशेष रूप से, 1938 सतपुड़ा निचले भूपर्पटीय भूकंप उद्गम केंद्र के आर-पार बनाए गए एक नए प्रतिरोधकता प्रतिरूप, ने भी अधिक द्रव तत्व (2.2 - 6.5 मात्रा %) युक्त स्थानिक गहरे भूपर्पटीय मंडल दर्शाए, जो कि उच्च रंध्र दाब स्थितियों को सूचित करता है। उपरोक्त प्रेक्षण और इस क्षेत्र के लिए देखी गई सार्थक विकृति दर निचली भूपर्पटी में घटित होने वाली भंगुर विफलता के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ (प्रबल / साधारण शैल सामर्थ्य, साधारण तापमान, उच्च रंध्र दाब और उच्च विकृति दर) तैयार करती है। ऐसा लगता है कि मध्य निचली पर्पटी में तरल पदार्थ भरी कोटरिकाएँ या तो स्थानीय विकृति (तरल दाब) के स्रोत के रूप में, जो कि क्षेत्रीय प्रतिबल के साथ मिलकर भूकंपोत्पत्ति की क्रांतिक प्रतिबल परिस्थितियाँ पैदा करती हैं, या अल्प प्रतिरोधक (कमजोर) मंडलों में विवर्तनिक विकृति जमाव, जिसे भूकंप पैदा करने के लिए भूकंप की उत्पत्ति करने वाले भ्रंशों में स्थानांतरित किया जा रहा है, के लिए अनुकूल स्थिति पैदा करने हेतु शैलों के अपरूपण सामर्थ्य को कम करके भूकंप उत्पत्ति को उत्प्रेरित करती हैं।

मैग्नेटोटेलूरिक विभेदन पर परिगणन आवृत्ति पृथक्करण के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए एक तकनीक विकसित की गई है। अधस्तल चीजों के विभेदन की बढ़ोत्तरी को लक्ष्य बनाकर, मैग्नेटोटेलूरिक (एम टी) पद्धति के लिए एक परिगणन (लक्ष्य) आवृत्ति पृथक्करण मानदंड प्रस्तावित किया गया है।

नाम पदनाम
श्री अशोक बाबु जी वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक
डॉ. पात्रो बी.पी. के प्रधान वैज्ञानिक
डॉ. नागांजनेयुलु के वरिष्ठ वैज्ञानिक
डॉ. अब्दुल अजीज वरिष्ठ वैज्ञानिक
श्री प्रदीप नाइक वैज्ञानिक
श्री चिन्ना रेड्डि के वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी (1)
श्री नरेन्द्र बाबु तकनीकी अधिकारी
श्री अरविन्द कुमार गुप्ता तकनीकी सहायक
श्री अप्पल राजु पी तकनीकी सहायक
श्री मोतुकूरि शिव कृष्णा तकनीकी सहायक
श्री बालकृष्णा सी मल्टी टास्किंग स्टाफ

 

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 08-11-2019