जलभूवैज्ञानिक, जलरसायनिक और समस्थानिक परीक्षण भूजल के संबंध में उपचारात्मक उपाय बताने के लिए आवश्यक भूजल पुनर्भरण का मूल्यांकन, भूजल के संभाव्य मंडल और भूजल का आवासीय समय (14 कार्बन कालनिर्धारण), भूजल गुणवत्ता/संदूषण, मृदा संदूषण और संबंधित क्रियाविधियों का मूल्यांकन करने के लिए किए जाने वाले अनुसंधान के मुख्य क्षेत्र हैं। जल के रासायनिक और समस्थानिक संघटन पर नियंत्रण रखने वाले कारकों की जांच करने के लिए इस अनुसंधान में प्रयोगशाला और क्षेत्र आधारित कार्य दोनों के साथ-साथ संख्यात्मक प्रतिरूपण शामिल हैं। चयनित अध्ययन क्षेत्रों में तटीय जलभरों में भूजल का जलभूरसायनिक और समस्थानिक अभिलक्षणन, मृदा-जल-शैल अंत:क्रिया और लवण-शुद्ध जल मिलन बिन्दु/अंत:क्रिया को समझना इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य है। रासायनिक गुणधर्मों में विभिन्नताएं पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करने में  सहायता करती हैं, जिनमें से कुछ केस अध्ययन यहां उल्लेख किए गए हैं। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा के पास में प्रस्तावित उपनगर में, स्थल की उपयुक्तता को स्पष्ट करने के लिए विद्यमान वेध कुंओं में जलभूवैज्ञानिक परीक्षण और जल गुणवत्ता अनुवीक्षण किया गया। नलगोंडा (तेलंगाणा), प्रकाशम और अनंतपुर (आंध्र प्रदेश) जिलों और द्वारका द्रोणी (पश्चिम बंगाल) में फ्लुओराइड से भरे भूजल मंडलों और उनके संभावित स्रोतों की पहचान जलरसायनिक और समस्थानिक औजारों का उपयोग करके की गई। मध्य प्रदेश (भारत) में छिंदवाड़ा जिले के एक गाँव में कृत्रिम पुनर्भरण तकनीकों के जरिए भूजल में फ्लुओराइड कम करने पर एक प्रयोग किया गया। हैदराबाद, रंगा रेड्डी, नलगोंडा और महबूबनगर जिलों में पेयजल स्रोत के रूप में उपयोग में लाए जाने वाले भूजल में यूरेनियम और संबंधित जल गुणवत्ता पैरामीटरों का मूल्यांकन किया गया है। भारी धातुओं और तेल उत्पादों के अभिगमन को नियंत्रित करने वाली भौतिक रासायनिक और जीव रासायनिक प्रक्रियाओं पर कुकटपल्लि जलसंभर, हैदराबाद के अधस्तल परिवेश में परीक्षण किया गया, जबकि उन्नाव – कानपुर औद्योगिक विकास क्षेत्र, (उत्तर प्रदेश) और पटानचेरु औद्योगिक विकास क्षेत्र (हैदराबाद) में संदूषक स्थलों की मृदा में संभवतः विषाक्त धातुओं का रासायनिक जाति उद्भवन और जैव प्राप्यता का अध्ययन किया गया है। वेध कुंओं में जल प्रदाय विभंग मंडलों का पता लगाने के लिए, ई सी, तापमान प्रोफाइलिंग और गहराई प्रतिचयन विधियाँ नियोजित की जा रही हैं। भारत के भूकंपीय रूप से सक्रिय कोयना-वार्ना क्षेत्रों में, वेध कुंओं (250 मीटर तक की गहराई) से नमूने के तौर पर लिए गए भूजल में मौजूद जलरसायनिक और समस्थानिक चिह्नकों का उपयोग करते हुए भूकंप पूर्वगामी अध्ययन किए जा रहे हैं। यह देखा गया है कि जलरसायनिक चक्र 5 से अधिक तीव्रता वाले स्थानीय भूकंपों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है और विविध आयनों की बढ़ती हुई सांद्रताएँ इस क्षेत्र में चालू भूकंप प्रक्रियाओं को अप्रत्यक्ष रूप से सूचित करती हैं। इस कार्यकलाप में, भारतीय भू-खंड के विविध भूवैज्ञानिक भूभागों में पुराभूकंपसंबंधी, पुराजलवायु संबंधी परीक्षण, सक्रिय भ्रंशों का अभिलक्षणन और मानचित्रण, जैविक पदार्थों का 14 कार्बन कालनिर्धारण जैसे औजारों का उपयोग करके क्षेत्रीय भूदृश्य और भूभाग का अभिलक्षणन, अवसादों का प्रकाशतः उद्दीपित संदीप्ति (ओ एस एल) कालनिर्धारण और अल्प तापमान ऊष्माकालानुक्रमिक विधियों को सम्मिलित करते हुए किए जाने वाले नवविवर्तनिकी और भूगतिकीय अध्ययन भी शामिल हैं।

नाम पदनाम
डॉ. देवेन्द्र कुमार प्रधान वैज्ञानिक
डॉ. राम मोहन के वरिष्ठ वैज्ञानिक
डॉ. प्रभा पाण्डेय वैज्ञानिक
डॉ. अतुल्य कुमार मोहंती वैज्ञानिक
श्री सत्तय्या एन तकनीकी अधिकारी
श्री किरण कुमार बी तकनीकी सहायक
श्रीमती भाग्यवती एम. एस वरिष्ठ तकनीशियन (2)
श्री एल्लम के प्रयोगशाला सहायक

 

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 26-07-2019