भूगणित, गुरुत्व, चुंबक-विज्ञान, ऊष्मीय भूभौतिकी, पुराचुम्बकत्व तथा शैल यांत्रिकी

सीएसआईआर-राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) की स्थापना से ही गुरुत्व एवं चुंबकीय अध्ययन समूह सक्रिय रूप से भूगतिक प्रक्रियाओं के अनुसंधान के साथ–साथ प्राकृतिक संसाधनों के अन्वेषण में शामिल रहा है। सैद्धांतिक विकासों ने अलग-अलग गहराइयों पर स्थित प्रेरणार्थक स्रोतों की गहराई को निर्धारित करने के लिए स्पेक्ट्रमी क्षय के उपयोग पर, शून्य मुक्त-वायु विसंगति के आधार पर बृहत् तरंग दैर्घ्य समस्थितिक क्षेत्रीय विसंगतियों को हटाने पर ध्यान केंद्रित किया है, परिमित तत्व विधि के आधार पर क्षेत्रीय-अवशिष्‍ट पृथक्करण को विकसित किया गया है,  हांकेल रूपान्तर का उपयोग करके दीर्घ अंकीय फिल्टर संकारकों का रूपांकन किया, बहुभुजों से घिरे 2 विमीय एवं 3 विमीय यादृच्छिक आकार के पिंडों के कारण होने वाली गुरुत्व एवं चुंबकीय विसंगतियों का एक साथ अभिकलन करने के लिए कलनविधियों का रूपांकन किया, चुंबकीय/वायु चुंबकीय आंकड़ों से क्यूरी गहराई के आकलन के लिए केन्द्रक विधि का संशोधन किया।

भारत का नया गुरुत्व मानचित्र (2006) इस समूह का एक प्रमुख उत्पाद है, जिसे देश भर में कई अन्य संगठनों (जीएसआई, ओएनजीसी, ओआईएल) के साथ मिलकर तैयार किया गया है। गुरुत्व स्टेशनों के लिए विस्तृत भू-भाग संशोधन लागू करके, और भूगणितीय संदर्भ प्रणाली 1980 (जीआरएस80), तथा अंतरराष्ट्रीय गुरुत्व मानकीकरण नेट 1971 (आईजीएसएन71) आंकड़ों पर आधारित नए सैद्धांतिक गुरुत्व सूत्र को अपनाते हुए 3 चाप अंतराल पर 51,356 गुरुत्व स्टेशनों से प्राप्त आंकड़े इस मानचित्र में शामिल किए गए थे।

नर्मदा-सोन स्थलानुरेख के समानांतर किए गए बूगे विसंगति के गुणात्मक अध्ययन के आधार पर, कुरैशी (1964) ने निष्कर्ष निकाला कि गुरुत्व का उच्च मूल्य एक उत्खंड प्रकार की संरचना को सूचित करता है जिसमें भूपर्पटीय उत्थान भूपर्पटी के अन्दर ऊपरी प्रावार के पदार्थ के समावेशन के कारण से हुई गति से जुड़ा था। इस तर्क की पुष्टि आगे एयरी के समस्थितिक विसंगति मानचित्र (एनजीआरआई, 1975), जहाँ सतपुड़ा पर्वत श्रेणी धनात्मक समस्थितिक विसंगति से अभिलक्षणित की गई है, में देखी गई अल्प-क्षतिपूर्ति द्वारा की गई। हाल ही में, भूपर्पटी के तल पर एक मोटी अभिवर्धित आग्नेय परत दक्कन ज्वालामुखीय प्रांत और राजमहल ट्रैप्स के नीचे निरूपित की गई है। समस्थितिक गणनाएँ इस अनुमान की ओर इंगित करती हैं कि दक्षिणी कणिकाश्म भूभागों (एसजीटी) में संयत स्थलाकृतिक द्रव्यमान अति क्षतिपूरित है, और अपरदित पृष्ठीय पदार्थ के लगभग 1.0 किलोमीटर के द्रव्यमान का हिसाब लगाना अभी बाकी है। अल्प प्रभावी प्रत्यास्थ मोटाई (टीई) / अल्प दृढ़ता अपरदन-प्रेरित भूपर्पटीय उतराई पर प्रतिक्षेप को प्रतिरोध कर सकने वाले अपेक्षित यांत्रिक बल की संभावित मौजूदगी को नकारती है। दक्षिणी कणिकाश्म भूभागों और पूर्वी भारतीय शील्ड्स में किए गए हाल के 2 विमीय एवं और 3 विमीय स्थलमंडलीय घनत्व प्रतिरूपण ने लगभग 130-140 किमी की गहराई पर स्थलमंडल-दुर्बलतामंडल सीमा (एलएबी) को निरूपित किया। पतला किया हुआ स्थलमंडल, गोंडवाना टूटने के दौरान दीर्घकालीन तापीय क्षोभ और / या तनन के कारण उपर्युक्त दोनों क्षेत्रों में हुए स्थलमंडलीय रूपांतरण का अकाट्य प्रमाण उपलब्ध कराता है।

ऊपरी असम और अरुणाचल प्रदेश के एक हिस्से पर, मिजोरम तथा बिहार में गंगा द्रोणी के पूर्वी हिस्से में आधार विन्यास को निरूपित करने के लिए इस समूह द्वारा व्यापक गुरुत्व-चुंबकीय अध्ययन किए गए। कृष्णा-गोदावरी द्रोणी, दक्षिण रीवा द्रोणी आदि में उथले गैस अन्वेषण के लिए बीकानेर-नागौर द्रोणी की अवकैम्‍ब्रियन पेट्रोलियम तंत्र पर इसी तरह का गुरुत्व-चुंबकीय अध्ययन किया गया है। एकीकृत भूभौतिकीय अन्वेषण कार्यक्रम के तहत सौराष्ट्र में लगभग 15,000 गुरुत्व आंकड़े, कच्छ में 3500 गुरुत्व आंकड़े, और मध्य भारत में दक्कन सिनेक्लाइज में 10000 से अधिक गुरुत्व आंकड़े ~2 किलोमीटर के अंतराल पर इस समूह द्वारा संग्रहीत किए गए। एकीकृत प्रतिरूपण ने आधार से पहले 500 से 3000 मीटर तक की गहराई पर मौजूद भूमिगतट्रैपीय मध्यजीवी अवसादों के 3विमीय विन्यास को निरूपित किया। यह अध्ययन लगभग 4-7 किमी की औसत गहराई पर आधार में कई उच्च–घनत्व अंतर्वेधी पिंडों को भी निरूपित करता है जो कि अध्ययन क्षेत्र की अवशिष्ट गुरुत्व असंगति से बेहतर रूप से मेल खाता है। इस समूह ने मध्य भारत में मैंगनीज के लिए व्यापक गुरुत्व-चुंबकीय अध्ययन भी किया है।  

पृथ्वी के द्रव्यमान संतुलन में परिवर्तनों से संबंधित गुरुत्व में कालगत परिवर्तनों के अध्ययन ने एक ओर विरूपण और भूकंप उत्पत्ति में और दूसरी ओर जलीय परिवर्तनों में अनुसंधान करने के लिए प्रेरित किया।

पुराचुंबकत्व अध्ययन सीएसआईआर-एनजीआरआई में बहुत पहले 1960 में शुरू हुए हैं, जहाँ शैलों में प्राकृतिक अवशिष्ट चुंबकीभवन को मापने के लिए अस्थैतिक चुंबकत्वमापी जैसे पुराने क्लासिकी उपकरणों से लेकर आज-कल की सुग्राही प्रचक्रक चुंबकत्वमापियों तक अभिकल्पन तथा संचालन किया गया। इस समूह ने अतीत काल में ध्रुव स्थितियों को निर्धारित करने और महाद्वीपों का पुनर्निर्माण करने के द्वारा भारत में भूवैज्ञानिक समय मापक्रम में विभिन्न काल समूहों से संबंधित आग्नेय, अवसादी एवं ज्वालामुखीय सहित विभिन्न शैल इकाइयों का अध्ययन करके महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत को स्पष्ट करने में एक पहल की है। धारवाड़ क्रेटॉन के डाइकों पर, दक्षिणी कणिकाश्म भूभाग, लोणार झील, दक्कन ट्रैप्स, राजमहल एवं सिलहट ट्रैप्स, अवसादी द्रोणियाँ (सिवालिक, कावेरी, कच्छ, विंध्यायी), उत्तर पूर्वी भारत में शिलांग पठार, कोयना वेधछिद्र प्रवेधन कार्यक्रम और किम्बरलाइटों पर बहुत ज्यादा काम किया गया। 

नाम पदनाम
डॉ. वी.एम. तिवारी निदेशक
डॉ. सिंह ए.पी मुख्य वैज्ञानिक
डॉ. अभय राम बंसल प्रधान वैज्ञानिक
डॉ. वेंकटेश्वर्लु एम प्रधान वैज्ञानिक
डॉ. नीरज कुमार वैज्ञानिक
डॉ. वासंती ए वैज्ञानिक
श्री तिरुपति एम वरि. तकनीकी अधिकारी (3)
श्री अमोल एकनाथ मेश्राम तकनीकी अधिकारी
श्री रमेश बाबु एन तकनीकी अधिकारी
श्रीमती स्वर्णप्रिया सी.एच तकनीकी सहायक
श्री नागेश्वर राव बी तकनीकी सहायक
श्री नरकुला श्रीनिवास राव तकनीकी सहायक
श्री सुजातुल्ला खान एमडी प्रयोगशाला सहायक

 

पृष्ठ अंतिम अपडेट : 11-10-2019