भूरसायन विज्ञान एवं भूकालानुक्रम विज्ञान

भूरसायन प्रभाग सीएसआईआर-एनजीआरआई का एक अभिन्न अंग है और पृथ्वी की पर्पटी एवं उसके अभ्यंतर से संबंधित विविध अनुसंधान कार्यक्रमों में शामिल है। इसकी गतिविधियाँ पृथ्वी की पर्पटी का भूगतिकीय क्रमिकविकास और देश भर में अयस्क निक्षेपों की संभाव्यता एवं उत्पत्ति को बेहतर समझने पर केंद्रित है। इन जटिल वैज्ञानिक समस्याओं के समाधान खोजने की पद्धति में बहु-विषयी अध्ययन किया जाता है। इसमें क्षेत्र भूविज्ञान, शैलवर्णन, संपूर्ण शैल भूरसायनिकी, खनिज भूकालानुक्रम विज्ञान (U-Pb ज़रकॉन, फ़ॉस्फेट, Pb-Pb बैडलिआइट) एवं रेडियोसक्रियताजन्य समस्थानिक शामिल हैं। इस समूह ने दक्षिणी भारत में आद्यमहाकल्पी महाद्वीपीय भूपर्पटी का क्रमिकविकास, आरंभिक जीवन की उत्पत्ति, स्वर्ण एवं लौह खनिजीभवन, निक्षेपण परिवेशों को समझने की दिशा में गत दशक में काफी योगदान दिया। भूरसायनिकी प्रभाग में अत्याधुनिक विश्‍लेषणात्मक सुविधाएँ हैं, और विख्यात अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान समूहों के साथ इसके चिरकालिक सफल सहयोग हैं।

सीएसआईआर-एनजीआरआई में भूकालानुक्रम विज्ञान एवं रेडियोसक्रियताजन्य समस्थानिक अनुसंधान का प्राथमिक ध्यान भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों को शामिल करते हुए कई तरह के स्तरिक एवं विवर्तनिक व्यवस्थापनों से प्राप्त ज़रकॉन (ZrSio4), भारतीय उप-महाद्वीप के दोनों तटीय एवं अपतटीय भूगर्भीय अभिलेखों का उपयोग करके चतुर्थ काल के दौरान सतही प्रक्रियाओं के बीच का अनुबंधन, ज्वालामुखीय गतिविधि, अवसादन और विवर्तनिकी, और प्रारंभिक आद्यमहाकल्प के बाद वायुमंडलीय ऑक्सीजन के क्रमिकविकास को समझने पर है। यह अनुसंधान कार्य क्यू-आईसीपीएमएस, एमसी-आईसीपीएमएस, 213 एनएम एनडी-वाईएजी एलए प्रणाली, ईपीएमए एवं एसईएम-सीएल के संयोजन से तालमेल रखते हुए संपन्न किया जाता है।