जलभर पुनर्भरण

परियोजना का शीर्षक:
अति दोहन किए गए कठोर शैल क्षेत्रों में भूजल संसाधनों का विकास और प्रबंधन

कठोर शैल ग्रेनाइट भूभागों (अर्धशुष्क क्षेत्र) में कृषि और ग्रामीण पेयजल आपूर्ति के लिए भूजल का निर्वाह प्रधान महत्व रखता है। समय-डोमेन में भूजल निर्वाह के दो चरण होते हैं - भूजल प्रबंधन और भूजल की पुन:पूर्ति के क्रमवेशन से निरंतर माँग को पूरा करने के लिए किए जाने वाले उपायों में तेजी लाना। भूजल पर बढ़ती निर्भरता तथा क्षेत्रीय दोहन, जिनके परिणाम स्वरूप भूजल स्तरों में निरंतर गिरावट और बिगड़ती गुणता, के चलते प्राकृतिक और सहायक पुनर्भरण प्रक्रियाएँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, मानसून की अनिश्चितताओं की अतिविषम मौसमी परिस्थितियों और एक तरफ अति संभाव्य वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन तो दूसरी ओर वाह संचयन में अपर्याप्तता के कारण भारत में पुनर्भरण अध्ययन बहुत महत्व रखते हैं। इसलिए, पुन:पूर्ति की दर को मापने के लिए ही नहीं बल्कि भूपृष्‍ठ जल को संरक्षित करने और सूक्ष्म/स्थूल स्तरों पर कृत्रिम रूप से भूजल पुनर्भरण को बढ़ाने के लिए भी नई तकनीकें आवश्यक हैं।

परियोजना अध्ययन के लक्ष्य एवं उद्देश्य (2012-17)

  1. नमी परिवहन और पुनर्भरण मूल्यांकन के लिए ट्राइटियम को छोड़कर सीमित प्रयोगशाला एवं क्षेत्र मदद से कोई दूसरे वैकल्पिक अनुरेखक का विकास
  2. उथले, मध्यम और गहरे भौम जलस्तर की स्थियों के अंतर्गत नमी अभिवाह स्थानांतरण और पुनर्भरण
  3. कृत्रिम पुनर्भरण निर्माणों का प्रभाव मूल्यांकन
  4. परिक्षेपण गुणांक और वास्तविक भूजल प्रवाह वेग के मूल्यांकन के लिए वेध छिद्र अनुरेखक तकनीकें
  5. एन जी आर आई परिसर में पुरर्भरण तथा भूजल प्रबंधन अध्ययन

परियोजना का शीर्षक: भूत, वर्तमान तथा भविष्य जलवायु के अंतर्गत उत्तर-पश्चिमी भारत में भूजल तंत्रों की संरचना और गतिकी [जी ए पी-663-28(डी डब्ल्यू के)]

पंजाब और हरियाणा, जहाँ भूजल संसाधन बड़ा संकटग्रस्त माना जाता है, के जलोढ़ मैदानों में भूजल गतिकी तथा संभावनाओं को समझने के लिए उत्तर-पश्चिम भारत के अगभीर जलोढ़ एवं नदीय पुरावाहिका जलभर तंत्र का मानचित्रण करना महत्व रखता है। वर्तमान कार्य में, बालू के टीलों तथा अन्य प्रमुख शैल टुकड़ियों को गहराई के साथ अविच्छिन्न मानचित्रण करने के लिए उत्तर-पश्चिमी भारत में 2डी विद्युत प्रतिरोधकता टॉमोग्राफी पूरी की गई। 2डी प्रतिरोधकता टॉमोग्राफी नमूना डाटासेट से निमज्जित वाहिका (सूखा और कठोर बालू शैल समूह) की मौजूदगी स्पष्ट रूप से प्रकट हुई। निमज्जित वाहिका में असांतत्य व्युत्क्रमित 2डी प्रतिरोधकता खंडों में साफ दिखाई देता है। ये निमज्जित वाहिकाएँ भूजल प्रवाह के लिए एक परिरोधी परत और साथ में नाली के रूप में कार्य करती हैं। ये वाहिकाएँ गुप्त हैं और भूजल राशियों – जो कि एक बहुमूल्य संसाधन है, के सूचक हैं जिन्हें माँग एवं जरूरत पड़ने पर दोहन किया जा सकता है।

सीएसआईआर-एन जी आर आई परिसर में भूजल पुनर्भरण पर जल संरक्षण उपायों का प्रभाव

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चित्र 1 वर्षा उद्यान में एक वेध कुएँ स्थल पर जल संरक्षण उपाय करने से पहले और बाद में जल स्तर में सुधार

3

                          

चित्र 2 एन जी आर आई परिसर में भूजल प्रवाह मानचित्र (अगस्त 2013)

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चित्र 3 कसौर स्थल (केए-9) के साथ साथ पार्श्विक असांतत्य युक्त निमज्जित वाहिका असंगति और जलभर मंडल को दर्शाने वाला 2डी व्युत्क्रमित प्रतिरोधकता खंड

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चित्र 4 ततियना स्थल (टीएन-3) के साथ साथ 2डी व्युत्क्रमित प्रतिरोधकता खंड जो कि सुस्पष्ट निमज्जित वाहिका असंगति को दिखाता है जिसमें उसकी एक सी मोटाई, उसका पार्श्विक विस्तार और जलभर मंडल मौजूद है।

सीएसआईआर-एन जी आर आई के जलभर पुनर्भरण समूह द्वारा अंत:क्षिप्त ट्राइटियम अनुरेखक इस्तेमाल करके प्राकृतिक पुनर्भरण अध्ययन (1978-2010)

क्र.सं. अध्ययन क्षेत्र (नदी द्रोणी/ जलसंभर/प्रशासनिक क्षेत्र) देशांतर अक्षांश क्र.सं./th> अध्ययन क्षेत्र/th> देशांतर अक्षांश

 

ग्रेनाइट-नाइसी भूभाग

 

 

 

 

 

 

 

1

नोयिल

77

10

 

 

बेसाल्ट भूभाग

 

 

2

पोन्ननि

76.33

11

 

1

कुकडी

74.41

18.91

3

वट्टमलैकरै

77.33

11

 

2

गोदावरी पूर्णा

75.5

19.91

4

प. सुवर्णमुखी

76.5

13.5

 

3

जाम

78.6

21.2

5

मरवंका

77.5

14.5

 

4

शदोल

81.5

22.91

6

चित्रावती

77.83

14.25

 

5

पू. गोदावरी

82

17.05

7

आरेपल्ले

78.63

16.85

 

6

घाटिया

75.8

23.4

8

मन्निला

77.66

14.58

 

7

के ए पी एस, काक्रोपर

73.36

21.23

9

गंडेश्वरी (बंकुरा)

87

23.5

 

8

यू सी आई एल, भोपाल

77.4

23.27

10

पुत्रा

82.83

19

 

9

लोयर मानेर बेसिन

79.75

18.41

11

पर्लिजोरी

82.83

19.16

 

 

अवसादी भूभाग

 

 

12

शदोल

81.91

23

 

1

कुंदेरु

78.5

15.25

13

अप्पर हतनी

74.31

22.56

 

2

नैवेली

79.5

11.55

14

जी ए ई टी ई सी

78.5

17.25

 

3

शदोल

81.75

23.33

15

गुरुकनिपल्ले

78.91

13.45

 

4

अप्पर हतनी

74.4

22.55

16

एम सी तंडा

78.18

13.85

 

5

पू. गोदावरी

81.75

17.08

17

महेश्वरम

78.41

17.13

 

6

कल्लुगोट्ला

78.05

15.6

18

एन जी आर आई

78.55

17.41

 

7

तुम्मलपल्ले

78.3

14.3

19

गुम्मलबाविगूडेम

79.16

17.21

 

 

जलोढक शैलसमूह

 

 

20

केरला जी पी एस

76.5

10

 

1

नैवेली

79.25

11.46

21

वाइलेपल्ले

78.9

17.1

 

2

गंडेश्वरी

87.5

23

22

एस आई आई एल, तूतीकोरीन

78.1

8.8

 

3

उ 24 परगना

88.66

22.75

23

माधारम

78.4

16.7

 

4

द 24 परगना

88.56

22.38

24

एम ए पी एस, चेन्नई

80.16

12.55

 

5

नलंदा

85.5

25.25

25

आगली, पालघाट

76.57

11.07

 

6

चुरू

75.46

28.8

26

वझ़िकडवु मलप्पुरम जिला, केरल

76.28

11.33

 

7

सुदगड्डा

82.55

17.05

 

 

 

 

 

8

के सी पी

80.96

16.13

27

पझ़यनूर जी पी त्रिश्शूर जिला, केरल

76.42

10.67

 

9

पी ए यू, लुधियाना

75.8

30.9

28

श्रुंगेरी, कर्नाटक

72.66

19.82

 

10

सी एस एस आर आई, हरियाणा

76.95

29.71

चालू परियोजनाएँ:


परियोजना शीर्षक
परियोजना संख्या & द्वारा प्रायोजित

जलभर पुनर्भरण - अति दोहन किए गए कठोर शैल क्षेत्रों में भूजल संसाधनों का विकास और प्रबंधन

मुख्य प्रयोगशाला परियोजना
एम एल पी-6304-28(आर आर)

जलभर मानचित्रण - भारत के प्रतिनिधिक भूवैज्ञानिक शैल प्रदेशों में उन्नत भूभौतिकीय तकनीकें इस्तेमाल कर जलभर अभिलक्षणन करना।

जी ए पी-659-28(एस ए)

के-टेन परियोजना - बृहत्तर कच्छ का रैन, गुजरात (जी आर के) में पोटैश धारी प्राकृतिक बिटर्न निक्षेपों का मानचित्रण तथा मूल्यांकन

के-टेन-0105(आर के टी)

एम ओ ई एस परियोजना - भूत, वर्तमान तथा भविष्य जलवायु के अंतर्गत उत्तर-पश्चिमी भारत में भूजल तंत्रों की संरचना और गतिकी

जी ए पी-663-28(डी डब्ल्यू के)

एच ई ए आर टी – उत्तर-पूर्वी भारतीय क्षेत्र में पुराभूकंपी चिह्नकों का पता लगाना और समय निर्धारण व्यवरोध उपलब्ध कराना।

पी एस सी-0203(डी वी आर)

एम ओ ई एस परियोजना - कोयना क्षेत्र, पश्चिमी भारत में अल्पावधि पूर्वानुमान के लिए भूकंप का वास्तविक काल अनुवीक्षण करना और भूकंपोत्पत्ति को समझना।

जी ए पी-603-28(एन पी आर/डी वी आर)

आई एन डी ई एक्स - निम्न तापमान ऊष्मा कालानुक्रम विज्ञान का प्रयोग कर भारतीय शील्ड के कुछ हिस्सों और उत्तर-पूर्वी हिमालयों में भूदृश्य का क्रमिक विकास तथा पुराजलवायु के प्रति इसकी अनुक्रिया।

आई एन डी ई एक्स (पी एस सी-0204) (डीके)

कर्मचारी:

नाम पदनाम
डॉ. आर. रंगराजन

मुख्य वैज्ञानिक

डॉ. डी.वी. रेड्डी

मुख्य वैज्ञानिक

डॉ.मोगलि नन्दन

प्रधान वैज्ञानिक

डॉ. देवेन्द्र कुमार

प्रधान वैज्ञानिक

रत्नाकर धकाटे

वरिष्ठ वैज्ञानिक

डॉ. देवाशीश कुमार

वरिष्ठ वैज्ञानिक

श्री बी. किरण कुमार

कनिष्ठ तकनीकी सहायक

श्रीमती एम.एस. भगवती

वरिष्ठ तकनीशियन

श्री के. एल्लम

तकनीशियन

श्री ए. मोहन रेड्डी

तकनीशियन

श्री वी. वेंकटेशम

परियोजना सहायक

सेतबंधु मंडल

परियोजना सहायक